महाकाली साधना डॉ नारायण दत्त श्रीमाली बुक हिंदी पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड Mahakali Sadhna Dr. Narayan Datt Shrimali Hindi Book PDF free Download

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महाकाली जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है और दस महाविद्याओं में श्रेष्ठतम महाविद्या है। यह जीवन को समृद्धिमय, ऐश्वर्यमय बनाने वाली शत्रु संहारिणी, बाबा, अभाव, कष्ट, पीड़ा, तनाव, चिन्ता और समस्याओं को दूर करने वाली, जीवन को निरापद और आनन्दयुक्त बनाने वाली एकमात्र ऐसी देवी हैं, जो संन्यासियों के लिए भी सर्वाधिक पूज्य और आराध्य है;

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गृहस्थ व्यक्तियों के लिए भी यह आवश्यक, अनिवार्य और अद्वितीय महाविद्या है, जिसकी साधना, उपासना, सेवा और पूजा करना जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और ध्येय है।

महाकाली के बारे में शाखों में स्पष्ट रूप से बताया गया है, कि जीवन को निरापद बनाने के लिए एकमात्र काली ही ऐसी शक्ति है, जो अपने आप जीवन को पूर्ण सुरक्षित और उन्नतिशील बनाती हैं। पग-पग पर हमें बाधाओं, कष्टों और पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है। आकस्मिक संकट और राज्य भय से हरदम भयभीत रहना पड़ता है।

चिंता व तनाव से जीवन घुल जाता है, रोग से जीवन जर्जर हो जाता है, घर में कलह और अशांति की वजह से असमय बुढ़ापा और विविध समस्याएं आकर हमें घेर लेती हैं। ऐसे समय में अन्य किसी देवता की उपासना इतनी फलप्रद सिद्ध नहीं होती, जितनी कि महाकाली की उपासना अपने आप में फलप्रद और सुखदायक होती है।

कई साधकों को यह भ्रम है, कि महाकाली एक तीक्ष्ण देवी है और इसकी साधना में कोई भी त्रुटि रह जाती है, तो विपरीत परिणाम भोगने को तत्पर रहना चाहिए या विपरीत परिणाम भोगने को मिल जाता है।

जबकि ऐसी बात नहीं है, महाकाली अत्यन्त सौम्य और सरल महाविद्या है, जिनका रूप भले ही विकराल हो, गले में भले ही नरमुण्ड की मालाएं पहनी हुई हों, लाल-लाल आंखें और बिखरे हुए बाल हों, भगवान शिव की छाती पर पैर रखे हुए खड़ी हो, जिनके हाथों में खड्ग और आयुध हों, मगर इसके बावजूद भी उनके हृदय में करुणा, दया, ममता, स्नेह और अपने साधकों के प्रति अत्यधिक ममत्व है।

ऐसी महाविद्या, ऐसी देवी तो अपने-आप में सर्वसौभाग्यदायक कही जाती है, जिनकी उपासना और साधना ही जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि है।

काली के भेद

मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती खण्ड के आठवें अध्याय के अनुसार भगवती काली की उत्पत्ति जगत जननी जगदम्बिका के ललाट से वर्णित की गयी है, तथापि भगवती काली के असंख्य रूप भेद है। वस्तुतः समस्त देवी शक्तिया, योगिनिया आदि भगवती की प्रतिरूप स्वरूपा है, फिर भी प्रमुखतः इनके आठ स्वरूप माने गये हैं-

१. चिन्तामणि काली

२. स्पर्शमणि काली

३. सन्ततिप्रदा काली,

४. सिद्धि काली.

५. दक्षिण काली,

६. कामकला काली,

७. हंस काली एवं

८. गुह्यकाली ।

इनके अतिरिक्त ‘भद्र काली’, ‘श्मशान काली’ तथा ‘महाकाली’ इन तीनों भेदों की प्रमुखता से साधकों द्वारा आराधना की जाती है। भगवती काली के अनेक भेद है, उनमें दस महाविद्यान्तर्गत प्रथम महाविद्या भगवती को माना गया है, जो परब्रह्म शिव की परमशक्ति, साक्षात् ब्रह्मस्वरूपा, अनादि एवं अनन्ता है।

‘सप्तशती’ में भगवती आद्या काली के अवतार का ही वर्णन है। काली के अनेक रूप भेदों में ‘दक्षिणा काली’ स्वरूप सद्यः फलप्रद कहा गया है। इस रूप को ‘दक्षिणा कालिका’ नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

दक्षिणा कालिका के ही प्रकारान्तर से चार स्वरूप निर्धारित किए गये हैं। ये स्वरूप है गुल काली भद्रकाली, श्मशान काली तथा महाकाली ।

दक्षिणा काली को ही भगवती काली, अनादि रूपा, आद्या विद्या, ब्रह्म स्वरूपिणी तथा कैवल्य दात्री भी कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार भगवती काली आद्या शक्ति, चित्त शक्ति के रूप में विद्यमान होने के कारण अनादि, अनन्त, अनित्य व सबकी स्वामिनी हैं । वेद में काली की स्तुति “भद्र काली” नाम से की गयी है।

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