परातंत्र साधना पथ गोपीनाथ कविराज हिंदी बुक पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड Paratantra Sadhna Path Gopinath Kaviraj Hindi Book PDF free Download

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षट्चक्र-भेदन की परिणति

षट्चक्र-भेद न होने तक देहात्मबोध की निवृत्ति नहीं होती। अध्यात्म राज्य में प्रगति प्राप्त करने के लिये सर्वप्रथम अहंभाव को स्थूल अनात्मभाव से मुक्त करना होगा। तृतीय नेत्र अथवा ज्ञान चक्षु का उन्मीलन ही देह से मुक्त होने का पहला परिचय है। ज्ञान चक्षु अथवा प्रज्ञा चक्षु का उन्मीलन भौहों के मध्य कुछ ऊपरी भाग में होता है। इस अवस्था में साधक पचास वर्ण और उनसे उद्भूत नाद का अतिक्रमण कर विकल्पशून्य एक विशुद्ध ज्योति को प्राप्त होता है।

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यह ज्योति ही बिन्दु है, जिसे भेद कर व्यष्टि जगत् से समष्टि जगत् में प्रवेश करना पड़ता है। व्यष्टि से तात्पर्य पिण्ड देह तथा समष्टि से तात्पर्य ब्रह्माण्ड का बोध है। इसी प्रकार असंख्य ब्रह्माण्डों के समुदाय को महासमष्टि के अन्तर्गत जाना जाता है। समष्टि अर्थात् ज्ञान राज्य से निष्क्रमण और महाज्ञान राज्य में प्रवेश, ब्रह्माण्ड पुरुष के ज्ञान नेत्र का उन्मीलन है। इस नेत्र के उन्मीलन के पश्चात् ही महाज्ञान राज्य (महासमष्टि) में प्रवेश सम्भव होता है। यहाँ तक अज्ञान का खेल पूर्ण रूप से विद्यमान है।

हाँ व्यष्टि के अज्ञान से समष्टि का अज्ञान सूक्ष्म होता है एवं समष्टि के अज्ञान से महासमष्टि का अज्ञान और सूक्ष्म होता है। किन्तु सूक्ष्म होने पर भी अज्ञान अज्ञान ही है। महासमष्टि का अतिक्रमण होने पर जो ज्ञान का विकास होता है, वहीं पूर्ण ज्ञान है। इस परम राज्य में प्रवेश करने का जो द्वार है, उसका नाम भ्रमरगुहा है। भ्रमरगुहा चरम शून्य के बाद एवं पूर्ण सत्य के पहले अर्थात् दोनों के सन्धि स्थान में स्थित है। भ्रमरगुहा का भेद हो जाने पर वास्तविक सत्य राज्य में प्रवेश हो जाता है। व्यष्टि, समष्टि, महासमष्टि सभी काल राज्य तथा काल के नियंत्रण के अधीन हैं किन्तु सत्य राज्य यथार्थ गुरु राज्य है।

काल के राज्य में मन और माया का खेल रहेगा ही। गुरु राज्य में रात-दिन नहीं, सृष्टि-संहार नहीं तथा चित्-अचित् का विभाग भी नहीं है। गुरु राज्य वास्तविक स्वराज है, प्रेम का राज्य है, महाकरुणा का राज्य है। इस गुरु राज्य के भी अनन्त वैशिष्ट्य है।

सर्वमुक्ति एवं नवमुण्डी आसन

पंचमुण्डी आसन की चर्चा तन्त्रशास्त्र में थोड़ी बहुत दृष्टिगोचर होती है। श्री रामकृष्ण परमहंस, साधक रामप्रसाद, साधक कमलाकान्त आदि ने पंचमुण्डी आसन पर बैठकर साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त की थी। इस आसन से जन साधारण अपरिचित नहीं है। पर यह सत्य है कि सामान्यतया आसन रहस्य न जानने पर भी अनेक लोग पंचमुण्डी आसन के माहात्म्य को भलीभाँति जानते हैं। आसन तत्व का रहस्य जानना गम्भीर होने पर भी, योगी के लिये आवश्यक है।

परमाराध्यपाद श्री श्री विशुद्धानंद परमहंस देव द्वारा काशी धाम स्थित अपने आश्रम में श्री श्री नवमुण्डी महासन की स्थापना के उपरान्त, इस आसन का नाम चारों तरफ प्रसारित हुआ। परन्तु नवमुण्डी आसन का पंचमुण्डी आसन के साथ क्या सम्बन्ध है, यह जटिल प्रश्न अभी भी दुर्बोध्य है।

परमहंस देव ने आलोचना के सिलसिले में एक दिन कहा था, “चालीस वर्ष से भी अधिक समय के कठोर परिश्रम के बाद आज हम इस महासन की स्थापना में समर्थ हुये हैं। श्री काशी धाम ज्ञान क्षेत्र है, इसलिये इसी क्षेत्र में महाविज्ञान का केन्द्र स्वरूप यह महासन स्थापित हुआ। संकल्पित विज्ञान मन्दिर की कार्यकारिणी शक्ति का मूल स्रोत यही महासन है। इसकी शक्ति असीम है। यह क्रमशः फैलकर समय आने पर विश्व को व्याप्त करेगा। विज्ञानों की अर्थात् सूर्य विज्ञान आदि सब विज्ञानों की सफलता के सम्बन्ध में अब कोई सन्देह रहा नहीं।”

नवमुण्डी आसन परम पवित्र और महनीय है। इसका तत्व इतना गुह्य है कि साधारणतः इसके सम्बन्ध में परमहंस देव किसी से विशेष कुछ न कहते थे। लौकिक कामनाओं की सिद्धि का असाधारण सामर्थ्य इसमें है, यह वे कहते थे, किन्तु लोकोत्तर परमसिद्धि के मूल में यही एक मात्र महाशक्ति के रूप में कार्य करती है एवं करेगी, यह वे विशेष अन्तरंग भक्तों के सिवा और किसी से भी अभिव्यक्त नहीं करते थे।

साधारणतया, कुशासन, कम्बल, गलीचा, व्याघ्रचर्म, सिहचर्म आदि बहुत से बाहरी आसन साधक समाज में प्रचलित हैं। आगम में वर्णित छत्तीस तत्वों का भेद कर जब तक इनके ऊपर उठा न जा सके, तब तक विश्व का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। हम लोगों का जिस जगत् के साथ परिचय है.

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