श्रीविद्यार्णव तंत्रम् पूर्वार्द्ध प्रथम हिंदी बुक पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड ShreeVidharnav Tantram purvarddh Hindi Book PDF free Download

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तन्त्र एक विहंगमावलोकन

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भारतीयों के समस्त साधना की कुञ्जी है-तन्त्र समस्त सम्प्रदायों के सब प्रकार की साधनाओं का गुड़ रहस्य इस तन्त्रशास्त्र में निहित है। तन्त्र केवल शक्ति उपासना का ही प्रधान अवलम्बन नहीं है, अपितु सभी साधनाओं का एकमात्र आश्रय है।

इसमें स्थूलतम साधन प्रणाली से लेकर अति गुह्य मन्त्रशास्त्र और अति गुहांतर योगसाधनादि के समस्त क्रियाकौशलों का सविस्तर वर्णन है तत्वान्तर्गत दार्शनिक तत्त्व भी कम सूक्ष्म नहीं है। फिर भी ये प्रचलित दर्शनशास्त्रों के समान जटिल भाष्य, टीका और विविध मत-वाद द्वारा पाराक्रान्त या दुर्बोध्य नहीं है, परन्तु इनके दुर्बोध्य न होने पर भी जिन्हें साम्प्रदायिक साधनसङ्केत ज्ञात नहीं है,

उनके लिये तन्त्रोक साधनवाल में प्रवेश प्राप्त करना सहजसाध्य नहीं है।

जिस प्रकार मनुष्य की प्रकृति सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार की होती है, उसी प्रकार तत्रशास्त्र भी सात्विक, राजसिक और सामसिक भेद से तीन प्रकार का होता है तथा इसकी साधनप्रणाली भी उसी प्रकार गुणभेद से तीन प्रकार की व्याख्यात होती है। जिसकी जैसी प्रकृति अथवा रुचि हो, तदनुसार ती साधन एव को प्रहण कर साधन करने से वह जीवन को कृतकृत्य कर सकता है।

शक्ति जिस प्रकार देवस्वभाव अथना देवी गुणयुक्त जीवा की जननीरूपा है, उसी प्रकार यह असुर गुणयुक्त अथवा असुरों की भी जननी है।

इसी कारण असुर और देवता- दोनों ही उसकी उपासना में प्रवृत्त होते है तथा दोनों ही अपने-अपने स्वभावानुसार उपासना की प्रणाली का अवलम्बन करते है साथ ही उनका साधनफल भी साधना को प्रकृति के अनुसार ही होता है। इसी कारण शास्त्र दोनों प्रकार की साधन प्रशाली बतलाते हैं।

भरतवर्ष में जो वेदों का अनुसरण करते हुए चलते हैं, वे साधारणतः पाँच उपासक सम्प्रदाय में विभक्त है- गाणपत्य, सौर, शाक्त, वैष्णव और शैव ये लोग नस्तुतः पृथक् पृथक् देवताओं के उपासक नहीं है, अपितु सभी उस एक ही विश्वतोमुख भगवान् की पृथक-पृथक पक्षभावों में उपासना करते हैं।

अतः इन सब देव देवियों में भेदकल्पना करना अपनी अल्पशता का ही द्योतक है। पद्मपुराण में श्रीभगवान् कहते भी हैं- ita शैवगणेशा वैष्णवाः शक्तिपूजकाः। मामेव ते प्रपयन्ते वर्षाम्भः सागरं यथा ।।

प्रकृति के साथ संयुक्त होकर पुरुष बद्ध होता है। बद्धावस्था में विविध सन्तापों से क्लिष्ट होकर वह मुक्ति का उपाय खोजता है। परन्तु पुरुष के इस दुःख-ग्रहण करने का हेतु क्या है? इसका उत्तर ‘पुरुष का अज्ञान’ नहीं कहा जा सकता। यह संयोग अनादि बतलाया जाता है, तो क्या पुरुष अनादि काल से अज्ञान में है?

विज्ञानभिक्षु कहते हैं कि इस संयोग के होते हुए भी पुरुष विकारी नहीं है। प्रधान अर्थात् प्रकृति के कार्य को जब पुरुष देखता है तभी भोक्तृ- भोग्यसम्बन्ध होता है।

अतएव प्रकृति जब भोग्या होती है तभी उसे भोक्ता पुरुष की अपेक्षा होती है और जब प्रकृति अनादि है, तब अनादिभोग्या प्रकृति के भोक्ता का भी अनादि होना अनिवार्य है। दोनों के संयोग का यही कारण है।

इसके बाद यह प्रश्न आता है कि जब पुरुष प्रकृति का भोक्ता भोग्य सम्बन्ध अनादि है तब उसकी दूसरे प्रकार की प्रवृत्ति अर्थात् मुक्ति की इच्छा कैसे होती है?

जो हो, इस प्रकार प्रकृति के साथ सम्बन्धयुक्त होकर पुरुष को प्रकृतिसुख नहीं मिलता, प्रकृति के धर्म दुःखत्रय को अपना मानकर उसके द्वारा पुरुष अपने को अत्यन्त निपीडित समझता है।

तब उससे मुक्तिलाभ करने की उसे इच्छा होती है, परन्तु यह मुक्ति मिले किस उपाय से ? इस पर सांख्यशास्त्र कहता है कि बुद्धि (प्रकृति का कार्यरूप बुद्धि) और के भेद का साक्षात्कार होने से ही मुक्ति होती है।

यही ज्ञान है। सांख्य के मत से दुःखनिवृत्ति का एकमात्र उपाय ज्ञान ही है। व्यक्त विकृति, अव्यक्त प्रकृति और श पुरुष है। शास्त्र में अन्यान्य उपाय भी बतलाये गये हैं, परन्तु वे सब उपाय पापादि दोष से दूषित हैं, इनसे विपरीत जो है वह पापादि दोष से दूषित नहीं है। प्रकृति-पुरुष के भेद का साक्षात्कार ही वह श्रेष्ठ उपाय है।

वह ज्ञान क्या वस्तु है? व्यक्त अर्थात् विकृति, अव्यक्त प्रकृति और ज्ञ अर्थात् पुरुष इनका विशेष रूप से ज्ञान होने पर ही प्रकृति-पुरुष का विवेकरूप ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

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