तांत्रिक सिद्धांत और साधना प. देवदत्त शास्त्री हिंदी Tantrik Siddhant or sadhna P. Devdatt Shastri Hindi Book PDF free Download

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Tantra siddhant or sadhna

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तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र और आधुनिक विज्ञान

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तन्त्र शब्द का पारिभाषिक अर्थ विज्ञान है। तन्त्र विज्ञान है और विज्ञान तन्त्र है। जिस तरह ज्ञान-विज्ञान का अन्त नहीं है, उसी प्रकार तन्त्र भी असंख्य हैं। जैसे वेद और वेदशास्त्र में, योग और योगशास्त्र में भेद होता है, उसी प्रकार तन्त्र और तन्त्रशास्त्र में भी भेद है। मन्त्र-शक्ति और मन्त्र-शक्ति से कार्य करने की युक्ति तन्त्र है और तन्त्र की पद्धतियाँ बताने वाला शास्त्र तन्त्रशास्त्र है ।

ज्ञान दो प्रकार का होता है-एक प्रत्यक्ष, दूसरा परोक्ष (काल्पनिक ) । प्रत्यक्ष शाम से यथार्थं का बोध होता है, किन्तु काल्पनिक ज्ञान पूर्णरूप से अथवा आंशिक रूप से सत्य भी हो सकता है और असत्य भी ।

प्रत्यक्ष ज्ञान का आधार काल्पनिक ज्ञाम होता है। आधुनिक जीव-विज्ञान, रसायन-विज्ञान, भूत-विज्ञान (फिजिषस) आदि इसके उदाह्रण हैं। जैसे फिजिक्स का ज्ञाता इस विषय को समझता है कि किस प्रकार विज्ञान के प्रत्येक विभाग में तत् तात्कालिक ज्ञान से कल्पना कर अनुसन्धान द्वारा अनुमान को सिद्धान्त बना लिया गया है।

तन्त्र का मत है कि एक ‘बिन्दु’ से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। इसी का समर्थन अव आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान भी करने लगा है। येलजियम के एक कास्मोला जिस्ट श्री आवेलेन ने यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि “एक महत् आदिविन्दू फटने से यह विश्व बना है, जैसा कि हम देखते हैं।” इस सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए अमेरिका के वैज्ञानिक ‘आर्ज गामो’ ने कहा है कि “किस प्रकार विश्य-रचना से पूर्व अवर्णनीय

ज्वाला से सभी विश्व निर्माणकारक तत्व समूह बने। इस महती ज्वासा में अणु क्या परमाणुओं का भी पता नहीं था, केवल एक प्रकार के स्वच्छन्य विद्युरकण (न्यूट्रोन) की धारा का प्रवाह था।”

तन्त्र के अनुसार ‘गामी’ द्वारा प्रतिपादित महाज्याला की तुलना हमारे वर्तमान ब्रह्माण्ड के सौरमण्डल की अन्तर्वाला से नहीं की जा सकती। क्योंकि हमारे सूर्य की अन्तर्जाला का तापमान केवल चार करोड़ डिग्री है और विश्व-रहमा से पूर्व के ताप का तो बनुमान ही नहीं किया जा सकता है, जिसकी गर्मी करोड़ों-लाखों वर्षों बाद जब कुछ शान्त हुई तब सूर्य और नक्षत्र बने । तन्त्र में उस कस्पनातीत महाज्वाला को ‘कोटिसूर्यप्रकाशा बायाशक्ति’ कहा गया है। उस समय यह आद्याशक्ति अकेली थी । दिशाएँ, दिक्ाक्ति और सदाशिव प्रेत हो रहे थे और कालशक्ति एवं महाकाल स्तब्ध पड़े हुए थे-

अवष्टभ्य पद्भ्यां शियं भैरवं च । तन्त्र के इस कथन का निरूपण आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली से इस प्रकार किया जा सकता है-

आद्याशक्ति आदि अवस्था (महाप्रलय) आदि अवस्था की दो प्रधान शक्तियाँ-

  • -सदाशिव
  • महाकाल

इनर्जी क्वान्टो मैक्सिमम एण्ट्रोपी ब्रेमिटेशन या पावर ऑफ फानफिगरेशन एलेक्ट्रोमेग्नेटिज्म

तन्त्र में सदाशिव और महाकाल दोनों वस्तुतः एक हैं; जो तान्त्रिक भेदाभेद का एक सिद्धान्त है। अपनी मृत्यु से लगभग दस वर्ष पूर्व एन्स्टाइन ने सर्वप्रथम इस तान्त्रिक भेदाभेद को समझ कर अपनी नवीनतम रचना ‘जेनरल रिलेटिविटी प्रिसिपल’ में इनकी मूल एकता सिद्ध की है।

तन्त्र में आधा मूलाशक्ति काली का वर्ण काला बताया गया है। ‘इनजीं बवान्दा’ की इस विशिष्ट अवस्था में विश्व घोर अन्धकार में व्याप्त रहता है। प्रकाश- शक्ति उस समय निष्क्रिय रहती है। एक साक्ष छियासी हजार दो सौ चौरासी मील प्रति सेकेण्ड गतिबाली प्रकाश-शक्ति उस समय सिकुड़ी सिमटी रहती है। सूर्य-पन्द्र बादि ग्रह-नक्षत्रों का कुछ अता-पता नहीं रहता है।

इस क्वान्टा इनर्जी का प्रतीक जिस प्रकार तन्त्र में ‘बिन्दु’ माना गयाहै, उसी प्रकार अव पाश्चात्य आधुनिक विज्ञान भी मानने लगा है। बिन्दु केन्द्र का प्रतीक है, इससे अधिक आधुनिक विज्ञान इसके सम्बन्ध में अभी तक कुछ नहीं जान पाया है। बिन्दु अपने रूप में अलक्ष्य है, इसलिए अव्यवहार्य होने के कारण अव्यक्त कहा जाता है। अव्यक्त बिन्दु की अभिव्यक्ति का जो क्रम आधुनिक विज्ञान बताता है, निस्कुल वही क्रम तन्त्रों में भी बताया गया है-

बिन्दु की पहली व्यक्तावस्था है त्रिकोण । इस त्रिकोण में ‘दिक्’ (स्पेस्) के तीन ‘डाइमेन्शन’ और एक काल ‘हाइमेन्शन’ परस्पर नित्य सम्बद्ध हैं। एक ही त्रिकोण नहीं बनता, बल्कि अनेक त्रिकोण इसलिए बनते हैं कि सभी प्रकार की गति-शक्तियों का मूल ‘एलेक्ट्रोमेग्नेटिज्म’ विविध प्रकार की गति लेता है। उसकी विभिन्न प्रकार की गतियों के ग्रहण से विविध त्रिकोण बनते हैं। विश्वरूपिणी षोडशी के श्रीयंत्र’ में यही सिद्धान्त दृष्टिगत है। आद्या के यन्त्र में केवल पाँच त्रिकोण है, इसलिए कि वह आदि अवस्था का बोधक है।

आदि में आकाश व वाष्प (बेपर) ही दिक् (स्पेस्) में था, इसके बाद वायु हुआ। वायु ने अपनी एक प्रकार की गति से अग्नि तत्त्व (गर्मी) उत्पन्न किया, अग्नि तत्व ने जल तत्व या द्रव (लिक्विड) तत्व उत्पन्न किया। जल तत्व को गमीं पर्याप्त मात्रा में कम होने पर पृथिवी या ठोस पदार्थ बना । करोड़ों-अरबों वर्षों तक यह दशा रहने के बाद दिक् (स्पेस्) अर्थात् सदाशिव की प्रेमिटेशम शक्ति और महाकाल (एलेक्ट्रोमेग्नेटिज्म) ने अनेकानेक तत्वों ऐलीमेण्ट्स) की सृष्टि की है। इसी सिद्धान्त के उदाहरण धीयन्त्र के इसने

त्रिकोण है। त्रिकोण के बाहर या पश्चातू जो वृत्त है, वह शक्ति की ‘रेडिएशन’ का चोतक है। इस वृत पर जो दल हैं, वे शक्ति के विभागों (सेक्शन्स) के द्योतक है।

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