विज्ञान भैरव तंत्र भैरव भैरवी संवाद हिंदी बुक पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड Vigyan Bhairav Tantra Bhairav Bhairvi sanvad Hindi Book PDF Free Download

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भारत की अध्यात्म परम्परा

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भारत की अध्यात्म परम्परा विश्व की सर्वाधिक प्राचीन परम्परा है। सृष्टि रचना में इसके मूल तत्त्व की खोज करना तथा सृष्टि रचना की प्रक्रिया को जानना ही इसका मुख्य विषय रहा है। आज का विज्ञान दृश्य की खोज में ही व्यस्त है किन्तु अदृश्य की खोज करना सबसे कठिन कार्य है जिसकी खोज करके भारत ने इस सम्पूर्ण विश्व में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान अर्जित किया है। यह सारा ज्ञान कोरी कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि विज्ञानसम्मत है जिस पर प्रयोग व परीक्षण किया जा सकता है।

भारत ने इस विषय पर जितना गहन, चिन्तन, मनन एवं परीक्षण किया है उतना किसी अन्य देश में नहीं हुआ। आज का बुद्धिजीवी वर्ग किसी भी सत्ता को तभी स्वीकार करता है जो तर्क, प्रयोग व प्रमाणों पर आधारित है। इस दृष्टि से भारत का अध्यात्म भी इस कसौटी पर खरा उतरता है जिसे आज तक चुनौती नहीं दी जा सकी है।

भारत ऐसे किसी सत्य को स्वीकार नहीं करता जिसे तर्क व प्रमाणों से सिद्ध नहीं किया जा सके। भारत का यह अध्यात्म किसी एक व्यक्ति की कल्पना व उसके कथन पर ही आधारित नहीं है बल्कि हजारों वर्षों तक विभिन्न ऋषियों द्वारा किए गए तर्क, प्रमाण, दृष्टान्त, वितर्क, आलोचना, प्रत्यालोचना के आधार पर ली गई निष्पत्ति है।

अतः इसे असत्य सिद्ध करना आज हजारों वर्षों में भी सम्भव नहीं हो पाया है। इसी आधार पर भारत को विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया गया जो अकारण नहीं है बल्कि युक्तिसंगत है।

ईश्वर की अवधारणा

भारत की ही भाँति दुनियों के कई धमों ने सृष्टि रचना के मूल तत्त्व को जानने का प्रयास किया कि यह सृष्टि है तो इसका कोई न कोई सृष्टा तो होना ही चाहिए। अधिकांश धर्मों ने इसके सृष्टारूप में ईश्वर की ही सत्ता को स्वीकर किया कि वही ईश्वर एक परमशक्ति है जो इस जड़ चेतनमय सृष्टि की रचना कर सकता है।

वही इसका एकमात्र कारणतत्त्व है किन्तु इसके स्वरूप का ऐसा चित्रण किया है कि जैसे वह कोई व्यक्ति स्वरूप हो जो किसी सम्राट् की भांति स्वर्ग में बैठा हो तथा सभी कुछ उसी की आज्ञा से हो रहा है। उसे सृष्टि से भिन्न माना।

कई विज्ञानवादियों तथा बुद्धिवादी वर्ग ने ऐसे ईश्वर के होने से ही इन्कार कर दिया कि ऐसा कोई ईश्वर हो ही नहीं सकता। यदि है तो उसका रूप, रंग, आकार आदि क्या है? उसका सृष्टि रचना का उद्देश्य क्या है? आदि कई तर्क देकर उसकी सत्ता से ही इनकार कर दिया जिससे एक नास्तिक वर्ग तैयार हो गया। इनका कहना है कि यह सारी कल्पना अवैज्ञानिक है जो व्यक्ति की मानसिक कल्पनामात्र है। इसे विज्ञानसम्मत नहीं माना जा सकता न ऐसे ईश्वर को प्रयोग व परीक्षण द्वारा ही सिद्ध किया जा सकता है। यह विवेक व तर्क से भी परे है। किसी जमाने में ऐसे ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर लिया गया हो किन्तु आज का बुद्धिजीवी वर्ग ऐसे ईश्वर को स्वीकार करने में अपने को असमर्थ पाता है।

आज दुनिया में कई ऐसी संस्थाएँ हैं जो इस अध्यात्म के विषय में काफी कार्य कर रही हैं व शोधकार्य भी किए जा रहे हैं किन्तु वे अभी पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकी है तथा कुछ तो भारतीय अध्यात्म से ही प्रभावित होकर कार्य कर रही हैं। इसमें थियोसोफी ने कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं जिसमें इस भारतीय अध्यात्म को ही वैज्ञानिक स्वरूप देने का प्रयास मात्र किया है। कुछ संस्थाएँ ऐसी भी हैं जो इस अध्यात्म विद्या को भौतिक दृष्टि से समझने का प्रयास कर रही हैं जो इस पर भौतिक विज्ञान की भाँति प्रयोग व परीक्षण करके समझने का प्रयास कर रही हैं किन्तु इस चेतनतत्त्व का विज्ञान इस जड़तत्त्व के विज्ञान से सर्वथा भिन्न प्रकार का है जिसे इस भौतिक तराजू पर तोला व परखा नहीं जा सकता। इसे जानने की विधि भिन्न है। यदि कोई इसे जानने का इच्छुक हो तो उसे आध्यात्मिक विधि का ही प्रयोग करना पड़ेगा। भारत ने उस चेतनतत्त्व को जानने की अनेक विधियों की खोज की है जिसका प्रयोग करके ही इसे जाना जा सकता है। सभी कुछ भौतिक ही है व चेतन नाम की कोई सत्ता ही नहीं है यह मान लेना ही एक मिथ्या धारणा है जिसका त्याग करना पड़ेगा तभी इसके रहस्यों को जाना जा सकता है।

भौतिक व अध्यात्म विज्ञान

इस सृष्टि रचना में भौतिक एवं अध्यात्म नाम वाली दो शक्तियों कार्य कर रही हैं जिनको जड़ व चेतन दो नाम दिए जा सकते हैं। इन दोनों की खोज दो भिन्न क्षेत्रों में हुई है जिनको भौतिक एवं अध्यात्म विज्ञान कहा जा सकता है। इस चेतनाशक्ति को जानने के विज्ञान को ही अध्यात्म विज्ञान कहा गया है। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करना आसान है क्योंकि उसकी खोज दृश्य पदार्थों पर ही आधारित है किन्तु यह चेतन तत्त्व अदृश्य है जिस पर खोज करना इतना आसान नहीं है। यह सामान्य बुद्धि की पकड़ से बाहर का विषय है जो अतिसूक्ष्म होने से सूक्ष्मबुद्धि का ही विषय है।

जो व्यक्ति केवल सांसरिक विषय भोगों में ही लिप्त है वे सो जन्मों में भी इस विद्या के रहस्यों को जानना तो दूर रहा इसे समझ भी नहीं सकते इसलिए यह विषय सर्वमान्य न हो सका तथा कुछ ही उच्चचेतना सम्पन्न मनीषियों का विषय बनकर रह गया। सामान्य व्यक्ति को इस ज्ञान को देने का शास्त्रों में निषेध भी कर दिया गया कि कोई भी गुरु स‌पात्र को ही इसका उपदेश करे, कुपात्र को इसका उपदेश कदापि न करे चाहे प्राणों पर संकट ही क्यों न उपस्थित हो। अतः यह ज्ञान सर्वमान्य न हो सका।

यदि कोई वैज्ञानिक इस चेतन तत्त्व को जानने की अभिलाषा रखता हो तो वह इसके लिए बताई गई विधियों पर प्रयोग करके जान सकता है। इसमें कोई बाधा नहीं है। बिना प्रयोग व परीक्षण किए किसी सत्य को इन्कार कर देना कोई बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। यह अध्यात्म विद्या केवल आस्था, श्रद्धा व विश्वास का ही विषय नहीं है बल्कि पूर्ण विज्ञान सम्मत है जो साधारण विज्ञान से भी अति उच्चकोटि का विज्ञान है जिससे जानने के लिए उतने ही अधिक श्रम की आवश्यकता है।

यह अध्यात्म विद्या इस चेतन शक्ति को जानने का विज्ञान है। यह चेतन शक्ति एक अदृश्य शक्ति है जो सृष्टि रचना का एकमात्र मूल कारण तत्त्व है सृष्टि की कोई भी रचना हो वह चेतन के बिना सम्भव ही नहीं है। कोई भी जड़तत्त्व अपने-आप कोई व्यवस्थित रचना नहीं कर सकता। चेतन के गुणधर्म जड़ से सर्वथा भिन्न हैं। सोचना, विचारना, चिन्तन व मनन करना सद् व असद् का विवेक करना, निर्णय करना, कल्पना करना, रचनात्मक कार्य करना नई योजना बनाना, अच्छे बुरे का ज्ञान करना, हित अहित की का ज्ञान, सही समय पर सही निर्णय लेना, इच्छाशक्ति, बात सोचना, उचित अनुचित का जाति की संकल्पशक्ति, आदि सभी इस गुण हैं जो जड़ तत्त्व में नहीं। पाये जाते।

वह जड़ तत्त्व इस चेतन शक्ति का उपकरणमात्र बन सकता है। वह स्वतन्त्र रूप से अपने आप कोई रचना नहीं कर सकता। अतः चेतन की सत्ता को ही मुख्य रूप से स्वीकार करना पड़ेगा। केवल इंट, चूने, पत्थर, सीमेन्ट से ही भवन की रचना नहीं हो सकती जबकि उसकी रचना किसी चेतन प्राणी द्वारा न हो। रोबोट की रचना भी किसी चेतन प्राणी ने ही की है। रोबोट चेतन की रचना नहीं कर सकता। अतः इस चेतन के विज्ञान को जानना ही सर्वाधिक महत्त्व का है।

यह जड़शक्ति एक अन्ध शक्ति है जो विनाश तो कर सकती है किन्तु रचना का कार्य, विवेकपूर्ण कार्य इससे सम्भव नहीं है जो केवल चेतन से ही सम्भव है किन्तु यह चेतनशक्ति केवल ज्ञानस्वरूप है जो स्वयं क्रिया नहीं कर सकती। बिना क्रिया के रचना भी नहीं हो सकती अतः यह चेतन शक्ति इसी की दूसरी शक्ति क्रियाशक्ति की सहायता से ही सृष्टि रचना का कार्य सम्पन्न करती है। यह क्रियाशक्ति इसी की सहयोगी शक्ति है जिसे आगे स्पष्ट किया जा रहा है।

पुराण साहित्य

इस चेतना शक्ति का विज्ञान इतना गूढ़ व रहस्यमय है कि स्थूल बुद्धि के यह पकड़ में नहीं आता। विज्ञान के प्रयोगों की भाँति इस पर किसी प्रयोगशाला में प्रयोग व परीक्षण भी नहीं किया जा सकता। इसको सूक्ष्मबुद्धि के तल पर ही समझा जा सकता है अतः यह ज्ञान सामान्यजनों की पहुँच से बाहर ही रहा। सामान्यजन को इस निराकार स्वरूप को समझने में बड़ी कठिनाई होती है तथा अशिक्षित व्यक्ति भाषा की कठिनाई के कारण इस निराकार को नहीं समझ सकता। इसको ध्यान में रखकर वेदव्यास जी ने पुराणों की रचना कर इसके गूढ़ रहस्यों व सिद्धान्तों को समझाने के लिए इनको साकार रूप देकर इसे कथा, कहानी, दृष्टान्तों आदि के रूप में प्रकट किया जिससे यह ज्ञान जनसामान्य तक पहुँच सका।

यदि यह पुराण साहित्य न होता तो वेदों व उपनिषदों के ज्ञान को कौन समझ सकता था व आज भी कितने व्यक्ति इसे समझ पा रहे हे हैं। पुराणों ने ही इस ज्ञान को बोचगम्य बनाया है। यदि भारत में इस पुराण साहित्य को निकाल दिया जाए तो भारत की यह अध्यात्म विद्या किस आधार पर टिकी रह सकती है यह सोचने का विषय है।

यह साकार की उपासना, व्रत, त्यौहार, मूर्ति पूजा, यज्ञ, याग आदि कर्मकाण्ड, तीर्थाटन दान, पुण्य, हवन, कीर्तन, मठ, सत्संग, कथा, प्रवचन आदि ये ही सब भारतीय अध्यात्म को जीवित रखने के उपकरण हैं जिनके आधार पर ही भारत की यह अध्यात्म परम्परा जीवित है जिनका आधार एकमात्र यह पुराण साहित्य है। निराकार व निर्गुण के आधार पर कौन सा समाज आध्यात्मिक बना है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। यह

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